छोटे और लघु किसानों की दुर्दशा: बढ़ती लागत, घटता सहारा
अंबिकापुर। कृषि कार्यों में लगातार बढ़ रही उत्पादन लागत ने छोटे एवं लघु किसानों की स्थिति को अत्यंत दयनीय बना दिया है। अब आलम यह है कि ऐसे किसान अपने खेतों से अधिक मजदूरी या अन्य अस्थायी कार्यों के सहारे जीवन यापन करने को मजबूर हो रहे हैं।
किसानों ने बातचीत में बताया कि कटाई, बुवाई से लेकर सिंचाई तक की लागत में बेतहाशा वृद्धि हुई है। खाद, बीज और दवाइयों के दाम आसमान छू रहे हैं। एक किसान ने बताया कि खाद की कालाबाजारी और मनमानी कीमतों के चलते उन्हें भारी आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ₹280 से ₹300 में मिलने वाली यूरिया अब खुले बाजार में ₹400 से ₹500 तक बेची जा रही है, वहीं डीएपी खाद ₹1900 से ₹2000 तक पहुँच चुकी है।
शासन की योजनाओं की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पोस्टर और विज्ञापनों में ‘नैनो डीएपी’ जैसी योजनाओं का प्रचार तो जोरों पर है, लेकिन किसानों तक इसके उपयोग, फायदे और विधियों की जानकारी पहुँच ही नहीं पाई है। किसानों ने स्पष्ट कहा कि उन्हें नैनो डीएपी की कोई ठोस जानकारी नहीं है, न ही कोई प्रशिक्षण दिया गया है।किसानों का आरोप है कि शासन और प्रशासन दोनों ही किसानों की समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं हैं। जनकल्याणकारी योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। विभागीय अधिकारी और स्थानीय प्रशासन खाद की कालाबाजारी पर अंकुश लगाने में असफल रहे हैं, जिससे किसान मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं। विपक्षी दलों की गतिविधियां भी महज औपचारिकता बनकर रह गई हैं। कुछ दिन पूर्व कांग्रेस पार्टी ने खाद संकट के विरोध में धरना-प्रदर्शन किया, लेकिन किसानों को आज तक उचित मूल्य पर खाद नहीं मिल रही है। किसानों की ये स्थिति सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि नीति और नीयत की असफलता को दर्शाती है। जरूरत है कि शासन-प्रशासन धरातल पर कार्य कर किसानों की वास्तविक समस्याओं का हल निकाले।
Author: Chhattisgarhiya News
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