बतौली में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा: हाई प्रोफाइल अतिक्रमण पर प्रशासन मौन, उठ रहे गंभीर सवाल
सरगुजा/बतौली। सरगुजा जिले के विकासखंड बतौली में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जे का एक बार फिर गंभीर और हाई प्रोफाइल मामला सामने आया है। पूर्व में लगभग एक हजार एकड़ शासकीय भूमि पर अवैध रूप से पट्टा बनवाकर लाभ लेने का बड़ा घोटाला उजागर हो चुका है, जिसमें बतौली के कई प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता सामने आई थी। उक्त प्रकरण में प्रशासन द्वारा कार्रवाई करते हुए अवैध पट्टों को निरस्त कर भूमि को गोचर मद में दर्ज किया गया था, जो वर्तमान में न्यायालय में प्रक्रियाधीन है।
इसके बावजूद बतौली क्षेत्र में शासकीय भूमि पर अतिक्रमण थमने का नाम नहीं ले रहा है। राजस्व विभाग को जानकारी होने के बाद भी कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि अवैध कब्जाधारियों को कहीं न कहीं प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है, जिससे उनके हौसले बुलंद हैं।
ताजा मामला राष्ट्रीय राजमार्ग-43 से सटे ग्राम पंचायत बासेन का है, जहां लगभग 2 एकड़ शासकीय गोचर भूमि पर खुलेआम अतिक्रमण कर अवैध निर्माण कार्य जारी है। आरोप है कि ग्राम पंचायत सिलमा निवासी रिटायर शिक्षक लालकेश्वर सिंह द्वारा शासकीय भूमि पर निर्माण सामग्री गिराकर बाउंड्रीवाल (अहर्ता) का निर्माण कराया जा रहा है। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि उक्त स्थल बतौली तहसील कार्यालय से मात्र 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, इसके बावजूद राजस्व विभाग द्वारा अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।
सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि राष्ट्रीय राजमार्ग-43 से लगी इस शासकीय भूमि को न तो राजस्व विभाग अपनी भूमि मान रहा है और न ही वन विभाग, जिससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि आखिर किसके संरक्षण में इस शासकीय भूमि पर अवैध निर्माण कराया जा रहा है।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, पूर्व में ग्राम पंचायत सिलमा के पटवारी रहे स्वर्गीय लालचंद द्वारा इस भूमि पर कब्जा किया गया था, जिसे बाद में उनके पुत्र रिटायर शिक्षक लालकेश्वर सिंह द्वारा आगे बढ़ाया गया। ग्रामीणों का कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्ग से लगी भूमि की बाजार कीमत लाखों रुपये में होने के कारण लगातार शासकीय भूमि पर कब्जा किया जा रहा है।
जब इस संबंध में स्थानीय पत्रकारों द्वारा सवाल किया गया तो बतौली की नायब तहसीलदार श्रीमती कृष्णा कंवर ने कहा कि “मामले की जांच कराई जाएगी तथा अवैध अतिक्रमण हटाकर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।”
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों ने सरकारी भूमि एवं वन क्षेत्रों पर अवैध अतिक्रमण को गंभीर समस्या मानते हुए राज्य सरकारों और प्रशासन को ऐसे अतिक्रमणों को शीघ्र हटाने तथा दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद सवाल यह उठता है कि आखिर किन प्रशासनिक दबावों या शासन सत्ता के प्रभाव में आकर बतौली प्रशासन कार्रवाई से बच रहा है?
यह भी उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में शासकीय भूमि पहले से ही अत्यंत सीमित है। जब प्रेस क्लब एवं पत्रकारों से संबंधित बुनियादी सुविधाओं की मांग उठती है, तब प्रशासन यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि “शासकीय भूमि उपलब्ध नहीं है।” ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब पर्याप्त मात्रा में शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा मौजूद है, तो उसे मुक्त कर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—पत्रकारों के हित में उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा?
क्या प्रशासन की मंशा लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को स्वतंत्र, सुरक्षित एवं निष्पक्ष बनाए रखने की नहीं है?
या फिर अवैध अतिक्रमण कार्यों में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत के कारण कार्रवाई नहीं हो पा रही है?
अब देखना यह है कि प्रशासन केवल बयानबाजी तक सीमित रहता है या वास्तव में न्यायालयीन निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई कर शासकीय भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराता है।
Author: Chhattisgarhiya News
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