छत्तीसगढ़ बदल रहा है, बढ़ रहा है… या बिक रहा है
जनसुनवाइयों में उबाल, जनआक्रोश और पुलिस–जनता टकराव ने खड़े किए गंभीर सवाल
रायपुर | जनवरी 2026 छत्तीसगढ़, जिसे कभी धान का कटोरा, प्राकृतिक सौंदर्य और शांत आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता था, आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ विकास के नाम पर जनभावनाओं को लगातार अनदेखा किया जा रहा है। बीते कुछ महीनों में राज्य के विभिन्न जिलों से सामने आई तस्वीरें न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि आने वाले समय में एक बड़े जनआंदोलन के संकेत भी देती हैं।
रायगढ़ में आयोजित जनसुनवाई के दौरान पुलिस और आम नागरिकों के बीच हुआ टकराव, तथा एक असहाय महिला के साथ सार्वजनिक रूप से की गई अमानवीय मारपीट और कपड़े फाड़ने जैसी घटनाएँ पूरे सामाजिक ताने-बाने को झकझोर देने वाली हैं। इस घटना का वीडियो वायरल होना व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
वहीं सरगुजा जिले के अमेरा कोल ब्लॉक एक्सटेंशन को लेकर हुई जनसुनवाई में ग्रामीणों और पुलिस के बीच तीखी झड़प, आंसू गैस का प्रयोग और पत्थरबाजी जैसी स्थिति यह दर्शाती है कि प्रशासन और जनता के बीच संवाद पूरी तरह टूट चुका है। इस दौरान एक महिला उप निरीक्षक का साहस चर्चा में रहा और उन्हें सम्मानित भी किया गया, किंतु मूल प्रश्न आज भी अनुत्तरित है—
ऐसी परिस्थितियाँ आखिर निर्मित क्यों हो रही हैं?
इसी प्रकार मैनपाट, जिसे “छत्तीसगढ़ का शिमला” कहा जाता है, वहाँ भी खनन परियोजनाओं को लेकर जनसुनवाई में व्यापक विरोध सामने आया। यह स्पष्ट संकेत है कि राज्य की प्राकृतिक धरोहरें, जंगल, जमीन और जल अब गंभीर खतरे में हैं।
कॉर्पोरेट उद्योगों द्वारा खदानों और परियोजनाओं का विस्तार तो हो रहा है, लेकिन सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) के दायित्वों का ईमानदार निर्वहन कहीं नजर नहीं आता।
सरगुजा संभाग में बीते चार महीनों से जर्जर सड़कों के कारण लगातार दुर्घटनाएँ हो रही हैं, लेकिन न तो किसी उद्योगपति की जिम्मेदारी तय हुई और न ही प्रशासन ने ठोस हस्तक्षेप किया।
रोजगार के नाम पर स्थानीय युवाओं को हाशिये पर रखा जा रहा है। प्रभावित क्षेत्रों में केवल मजदूरी दी जा रही है, जबकि अधिकारी और कर्मचारी बाहर से लाए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय लोगों के शोषण की भावना और गहरी होती जा रही है।
सबसे चिंताजनक प्रश्न यह है कि—
क्या पुलिस, जो आम जनता की रक्षक है, आज उद्योगों के हितों और जनआक्रोश के बीच खड़ी कर दी गई है?
क्या हमारा तंत्र इतना कमजोर हो चुका है कि विकास के नाम पर जनसंघर्ष को ही अपराध मान लिया गया है?
यदि समय रहते जनभावनाओं को नहीं समझा गया, पारदर्शी संवाद स्थापित नहीं हुआ और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ न्यायसंगत विकास मॉडल नहीं अपनाया गया, तो यह असंतोष आने वाले समय में बड़े जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
छत्तीसगढ़ को यह तय करना होगा कि वह
बदल रहा है, बढ़ रहा है—या धीरे-धीरे बिक रहा है।
Author: Chhattisgarhiya News
सच्ची बात सिर्फ छत्तीसगढ़िया न्यूज़ के साथ








