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हाईकोर्ट का अहम फैसला: बिना पंजीकृत त्यागपत्र/Relinquishment Deed से अचल संपत्ति का मालिकाना हक हस्तांतरित नहीं हो सकता

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हाईकोर्ट का अहम फैसला: बिना पंजीकृत त्यागपत्र/Relinquishment Deed से अचल संपत्ति का मालिकाना हक हस्तांतरित नहीं हो सकता

 

बिलासपुर/रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अचल संपत्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि ऐसा त्यागपत्र (Relinquishment Deed), जिसके माध्यम से अचल संपत्ति का अधिकार या स्वामित्व हस्तांतरित किया जा रहा हो, उसका पंजीकृत होना आवश्यक है। केवल गवाहों की मौजूदगी में दस्तावेज तैयार किए जाने से बिना पंजीकरण के संपत्ति का स्वामित्व हस्तांतरित नहीं हो सकता।

 

न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने यह टिप्पणी Narayan Soni & Ors. बनाम Kumari Niramala Soni & Ors., WP227 No. 1248 of 2026 में की। कोर्ट ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए निचली राजस्व अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा।

 

1981 में हुआ था नामांतरण

 

मामला उस संपत्ति से जुड़ा था, जिसमें बुची बाई का नाम वर्ष 1981 में राजस्व अभिलेख से हटाकर याचिकाकर्ता नारायण सोनी के नाम पर नामांतरण किया गया था। यह कार्रवाई एक ऐसे दस्तावेज के आधार पर हुई थी, जिसे याचिकाकर्ताओं की ओर से परिवारिक समझौता बताया गया।

 

बुची बाई की ओर से संबंधित राजस्व कार्यवाही में दस्तावेज को त्यागपत्र बताते हुए उसके आधार पर किए गए नामांतरण को चुनौती दी गई। एसडीओ ने मामले के गुण-दोष पर विचार करते हुए पाया कि दस्तावेज अचल संपत्ति में अधिकार हस्तांतरित करने वाला Relinquishment Deed है और इसके लिए पंजीकरण आवश्यक था।

 

एसडीओ ने वर्ष 1981 के नामांतरण को निरस्त करते हुए बुची बाई के वैधानिक उत्तराधिकारियों के नाम राजस्व अभिलेख में दर्ज करने का निर्देश दिया था।

 

गवाहों की मौजूदगी भी पंजीकरण की कमी पूरी नहीं कर सकती

 

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि दस्तावेज परिवारिक समझौता था, बुची बाई ने उसके निष्पादन को स्वीकार किया था और लंबे समय से उसी आधार पर कब्जा एवं राजस्व रिकॉर्ड चला आ रहा था।

 

हाईकोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि यदि दस्तावेज के माध्यम से अचल संपत्ति का स्वामित्व या अधिकार हस्तांतरित किया जा रहा है, तो उसका पंजीकरण आवश्यक है। दस्तावेज दो गवाहों की मौजूदगी में निष्पादित हुआ हो या उसे लंबे समय तक राजस्व रिकॉर्ड में आधार बनाया गया हो, इससे पंजीकरण की कानूनी आवश्यकता समाप्त नहीं होती।

 

कोर्ट ने कहा कि लंबा समय बीत जाने के बावजूद कानून की आवश्यकता यही है कि स्वामित्व हस्तांतरित करने वाला त्यागपत्र पंजीकृत होना चाहिए।

 

49 साल पुराने दस्तावेज पर भी लागू होगा कानून

 

मामले में संबंधित दस्तावेज के निष्पादन को लगभग 49 वर्ष पुराना होने और गवाहों की मौजूदगी का भी उल्लेख किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेज के पुराने होने से उसकी कानूनी कमी दूर नहीं हो जाती।

 

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि देरी के मुद्दे पर अतिरिक्त आयुक्त द्वारा की गई पुनर्विचारात्मक टिप्पणी उचित नहीं थी, क्योंकि देरी माफ किए जाने संबंधी एसडीओ के आदेश को वर्ष 2004 में बोर्ड ऑफ रेवेन्यू द्वारा पहले ही बरकरार रखा जा चुका था और वह आदेश अंतिमता प्राप्त कर चुका था।

 

बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के आदेश में नहीं मिली कोई त्रुटि

 

हाईकोर्ट ने कहा कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के आदेश में न तो कोई विकृति (perversity) पाई गई और न ही अधिकार क्षेत्र संबंधी कोई गंभीर त्रुटि सामने आई।

 

इसी आधार पर न्यायालय ने Narayan Soni एवं अन्य की याचिका खारिज कर दी।

 

फैसले का महत्वपूर्ण संदेश

 

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि अचल संपत्ति के स्वामित्व/अधिकार को त्यागने या दूसरे व्यक्ति के पक्ष में हस्तांतरित करने वाले दस्तावेज को केवल गवाहों के हस्ताक्षर या लंबे समय से चले आ रहे कब्जे/नामांतरण के आधार पर वैध स्वामित्व हस्तांतरण नहीं माना जा सकता, यदि कानून के अनुसार उसका पंजीकरण आवश्यक है।

 

केस: Narayan Soni & Ors. v. Kumari Niramala Soni & Ors.

केस नंबर: WP227 No. 1248 of 2026

पीठ: न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

विषय: बिना पंजीकृत Relinquishment Deed के आधार पर अचल संपत्ति का नामांतरण/स्वामित्व हस्तांतरण.

Chhattisgarhiya News
Author: Chhattisgarhiya News

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